बाँवरा
मन का क्या है, तन लागे नाफिरता रुं रुं, संग लागे ना।
काल काल फिरता ऐसे,
भूत भविष्य सब, अब ही जैसे।
बांधू तो कैसे बांधू,
चंचलता के इस बंधू को ?
बुद्ध हो जाऊं या बुत बन जाऊं,
कहीं बोधि वृक्ष पा के।
मन का क्या है, तन लागे ना
फिरता रुं रुं, संग लागे ना।
बे लगाम जब होगा स्थिर,
अपनाउंगी इसको फिर।
पृष्ठभूमि में रहने दो,
अनछुआ इससे बहने दो।
रवि ऋतू की लय में,
तरु पंछियों के रंग स्वर में,
बिन अवकाश निरंतरता से
स्वानंदी ही रहने दो।
मन का क्या है, तन लागे ना
फिरता रुं रुं, संग लागे ना।
बाँवरा तन न जाने इतना,
बिन मन के, सब तन मिट्टी,
सब तन पानी, सब तन अग्नि,
सब तन पवन, सब तन सृष्टि।
मन का क्या है, तन लागे ना
फिरता रुं रुं, संग लागे ना।