Sunday, 7 August 2016

EXISTENTIAL  QUESTIONS

मैं कौन, तू कौन ?
कहाँ से कहाँ ?
कब तक यहाँ?
सोचने लगा हूँ। 

अब हूँ, यहाँ हूँ 
हर में हूँ। 
तुझमें मैं, मुझमें तू,
समझने लगा हूँ। 

आया जहाँ, जहाँ वहीँ। 
अब जहाँ, कर्म वहीँ। 
कर्म कर , धर्म वही। 
सब अपनाने लगा हूँ। 

अपना क्या ?
है सब तेरा। 
अब तो साधन तेरा,
बनने लगा हूँ। 

Saturday, 14 May 2016

     बाँवरा 

मन का क्या है, तन लागे ना
फिरता रुं रुं, संग लागे ना।
काल काल फिरता  ऐसे,
भूत भविष्य सब, अब ही जैसे।

बांधू तो कैसे बांधू,
चंचलता के इस बंधू को ?
बुद्ध हो जाऊं या बुत बन जाऊं,
कहीं बोधि वृक्ष पा  के।

 मन का क्या है, तन लागे ना
फिरता रुं रुं, संग लागे ना।

बे लगाम जब होगा स्थिर,
अपनाउंगी इसको फिर।
पृष्ठभूमि में रहने दो,
अनछुआ इससे बहने दो।

रवि ऋतू की लय में,
तरु पंछियों के रंग स्वर में,
बिन अवकाश निरंतरता से
स्वानंदी ही रहने दो।

मन का क्या है, तन लागे ना
फिरता रुं रुं, संग लागे ना।

बाँवरा तन  न जाने इतना,
बिन मन के, सब तन मिट्टी,
सब तन पानी, सब तन अग्नि,
सब तन पवन, सब तन सृष्टि। 

 मन का क्या है, तन लागे ना
फिरता रुं रुं, संग लागे ना।

Friday, 13 May 2016

       स्वीकरण  


हुआ लुप्त रोष भी, सहिष्णुता में
अनचाहे को जब,
स्वीकार किया, स्वीकार किया।

मिट गया नाम भय का, अभियान में
अनिश्चित को जब,
स्वीकार किया, स्वीकार किया।

बैर भाव द्वेष सब ,  हुआ क्षमा
बुराई को जब,
स्वीकार किया, स्वीकार किया।

बदली  ईर्ष्या ,  बनी  प्रेरणा
पराई  सफलता को जब
स्वीकार किया, स्वीकार किया।

स्वीकरण ही सुख की कुंजी
स्वीकार किया, स्वीकार किया। 

Monday, 8 February 2016

क़ामयाबी                                                                                                               

पुकारा ज़माने ने नाम तुम्हारा,
क़ामयाब हो सबने जाना।
पड़े कदम चहुँ ओर तुम्हारे,
क़ामयाबी पे सब वारे वारे।

अनसुनी आवाज़ वो ,
केवल मन की आस हो।
ढूंढते जो कदम तुम्हारे,
अन्चली वो बाट हो।

चला चल मनुआ
ज़रा थम  के थोड़ा ,
क़ामयाबी तो
बातों का रोड़ा।

  7 Feb 2016

Thursday, 21 January 2016

मकर संक्रांत 

आज उड़ाओ दिल पतंग,
बेहद ऊँची, खुली स्वछंद। 
सूर्य किरणों  में लिपट ,
इन बहारों को सिमट। 
हो उड़ान अलबेली अनंत ,
विशालदर्शी मुक्तानंद। 

Thursday, 12 November 2015

पहली कविता ११ मार्च २०१२ 
            Sojourn

बहते पानी सा जीवन, 
                  छलक छलक के शांत हुआ। 
क्या घाट घाट पे अभिनय था? 
                  या मेरी व्याकुलता ?
हर घाट ने एक मंच दिया, 
                  अभिनय अपने आप हुआ। 
कहीं छलक के कहीं दबक के, 
                   बस बहाने का ही काम हुआ। 
बहते पानी सा जीवन, 
                   छलक छलक के शांत हुआ। 


बहना मेरा मकसद है, 
                   अभिनय तो मंच की फ़ितरत है। 
फिर क्यों इन किरदारों का, 
                   मुझ पर यह सिरताज हुआ?
समां गए मुझमें, सब किरदार यूँ, 
                   फिर भावनाओं की बौछार क्यों। 
कहीं खुद को खोया, कहीं खुद को पाया 
                    बस यही जीवन का आधार हुआ। 
बहते पानी सा जीवन, 
                   छलक छलक के शांत हुआ। 

Tuesday, 10 November 2015

November 11 2015
राज़ 


हवा में है  राज़, जीवन का,
जी भर के जी ले , जीवन मना । 

हवा में है नगमा, सुन  ज़रा, 
दे दो सुर तो,  सरगम यहाँ। 
कण कण  की कम्पन कहती, हाँ 
सब कुछ अभी, सब कुछ यहाँ। 
हवा में है राज़, जीवन का,
जी भर के जी ले , जीवन मना ।

हवा में  पैगाम लिखा हुआ,
जो पढ़ सको तो, दुरी कहाँ। 
अमन सुनाय , सदियों की बाणी, 
गूंजे मन में, बन अंतर्वाणी  ।  
हवा में है राज़, जीवन का,
जी भर के जी ले , जीवन मना ।

घूमें  हवा में सपनें  सभी,
ज़मीं पे तराशो तुम हीं अभी। 
संग हवा के चलते चलो,
न सीमा, न साथी, बहते रहो। 
हवा में है राज़, जीवन का,
जी भर के जी ले , जीवन मना