पहली कविता ११ मार्च २०१२
Sojourn
बहते पानी सा जीवन,
छलक छलक के शांत हुआ।
क्या घाट घाट पे अभिनय था?
या मेरी व्याकुलता ?
हर घाट ने एक मंच दिया,
अभिनय अपने आप हुआ।
कहीं छलक के कहीं दबक के,
बस बहाने का ही काम हुआ।
बहते पानी सा जीवन,
छलक छलक के शांत हुआ।
बहना मेरा मकसद है,
अभिनय तो मंच की फ़ितरत है।
फिर क्यों इन किरदारों का,
मुझ पर यह सिरताज हुआ?
समां गए मुझमें, सब किरदार यूँ,
फिर भावनाओं की बौछार क्यों।
कहीं खुद को खोया, कहीं खुद को पाया
बस यही जीवन का आधार हुआ।
बहते पानी सा जीवन,
छलक छलक के शांत हुआ।
Sojourn
बहते पानी सा जीवन,
छलक छलक के शांत हुआ।
क्या घाट घाट पे अभिनय था?
या मेरी व्याकुलता ?
हर घाट ने एक मंच दिया,
अभिनय अपने आप हुआ।
कहीं छलक के कहीं दबक के,
बस बहाने का ही काम हुआ।
बहते पानी सा जीवन,
छलक छलक के शांत हुआ।
बहना मेरा मकसद है,
अभिनय तो मंच की फ़ितरत है।
फिर क्यों इन किरदारों का,
मुझ पर यह सिरताज हुआ?
समां गए मुझमें, सब किरदार यूँ,
फिर भावनाओं की बौछार क्यों।
कहीं खुद को खोया, कहीं खुद को पाया
बस यही जीवन का आधार हुआ।
बहते पानी सा जीवन,
छलक छलक के शांत हुआ।
No comments:
Post a Comment