ललकार November 2012
ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।
विचलित मन, विचार समर में ,
ढूंढे कहीं आधार,
है बुलाती गहर सृष्टि की ,
हो जागृत उद्धार पाऊँ।
ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।
रही तरंगित तेरे रंगों में,
हुआ विदित आज मुझे।
जीवन मेरा बिंदु सा
सिंधु में समाऊं।
ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।
सुना निखारें , लपटें दुख की,
मैं, लिपटी सुख की।
बूंदों में सिमित कब की,
झांझर कहाँ से लाऊँ ?
ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।
है उमंग अभी कहीं,
भविष्य, तिमिर में भेद छुपाए।
झंकृत होती अंतर्वाणी
सृजन करूँ, निर्वाण पाऊँ।
ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।
ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।
विचलित मन, विचार समर में ,
ढूंढे कहीं आधार,
है बुलाती गहर सृष्टि की ,
हो जागृत उद्धार पाऊँ।
ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।
रही तरंगित तेरे रंगों में,
हुआ विदित आज मुझे।
जीवन मेरा बिंदु सा
सिंधु में समाऊं।
ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।
सुना निखारें , लपटें दुख की,
मैं, लिपटी सुख की।
बूंदों में सिमित कब की,
झांझर कहाँ से लाऊँ ?
ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।
है उमंग अभी कहीं,
भविष्य, तिमिर में भेद छुपाए।
झंकृत होती अंतर्वाणी
सृजन करूँ, निर्वाण पाऊँ।
ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।
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