Sunday, 1 November 2015

ललकार                                                                    November 2012

ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।

विचलित मन, विचार समर में ,
ढूंढे कहीं आधार,
है बुलाती गहर सृष्टि की ,
हो जागृत उद्धार पाऊँ।

ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।

रही तरंगित तेरे रंगों में,
हुआ विदित आज मुझे।
जीवन मेरा बिंदु सा
सिंधु में समाऊं।

ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।

सुना निखारें , लपटें दुख की,
मैं, लिपटी सुख की।
बूंदों में सिमित कब की,
झांझर कहाँ से लाऊँ ?

ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।

है उमंग अभी कहीं,
भविष्य, तिमिर में भेद छुपाए।
झंकृत होती अंतर्वाणी
सृजन करूँ, निर्वाण पाऊँ।

ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं। 

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