Thursday, 12 November 2015

पहली कविता ११ मार्च २०१२ 
            Sojourn

बहते पानी सा जीवन, 
                  छलक छलक के शांत हुआ। 
क्या घाट घाट पे अभिनय था? 
                  या मेरी व्याकुलता ?
हर घाट ने एक मंच दिया, 
                  अभिनय अपने आप हुआ। 
कहीं छलक के कहीं दबक के, 
                   बस बहाने का ही काम हुआ। 
बहते पानी सा जीवन, 
                   छलक छलक के शांत हुआ। 


बहना मेरा मकसद है, 
                   अभिनय तो मंच की फ़ितरत है। 
फिर क्यों इन किरदारों का, 
                   मुझ पर यह सिरताज हुआ?
समां गए मुझमें, सब किरदार यूँ, 
                   फिर भावनाओं की बौछार क्यों। 
कहीं खुद को खोया, कहीं खुद को पाया 
                    बस यही जीवन का आधार हुआ। 
बहते पानी सा जीवन, 
                   छलक छलक के शांत हुआ। 

Tuesday, 10 November 2015

November 11 2015
राज़ 


हवा में है  राज़, जीवन का,
जी भर के जी ले , जीवन मना । 

हवा में है नगमा, सुन  ज़रा, 
दे दो सुर तो,  सरगम यहाँ। 
कण कण  की कम्पन कहती, हाँ 
सब कुछ अभी, सब कुछ यहाँ। 
हवा में है राज़, जीवन का,
जी भर के जी ले , जीवन मना ।

हवा में  पैगाम लिखा हुआ,
जो पढ़ सको तो, दुरी कहाँ। 
अमन सुनाय , सदियों की बाणी, 
गूंजे मन में, बन अंतर्वाणी  ।  
हवा में है राज़, जीवन का,
जी भर के जी ले , जीवन मना ।

घूमें  हवा में सपनें  सभी,
ज़मीं पे तराशो तुम हीं अभी। 
संग हवा के चलते चलो,
न सीमा, न साथी, बहते रहो। 
हवा में है राज़, जीवन का,
जी भर के जी ले , जीवन मना 

   

Sunday, 1 November 2015

ललकार                                                                    November 2012

ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।

विचलित मन, विचार समर में ,
ढूंढे कहीं आधार,
है बुलाती गहर सृष्टि की ,
हो जागृत उद्धार पाऊँ।

ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।

रही तरंगित तेरे रंगों में,
हुआ विदित आज मुझे।
जीवन मेरा बिंदु सा
सिंधु में समाऊं।

ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।

सुना निखारें , लपटें दुख की,
मैं, लिपटी सुख की।
बूंदों में सिमित कब की,
झांझर कहाँ से लाऊँ ?

ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं।

है उमंग अभी कहीं,
भविष्य, तिमिर में भेद छुपाए।
झंकृत होती अंतर्वाणी
सृजन करूँ, निर्वाण पाऊँ।

ललकारते रहना मुझे ज़िन्दगी,
निश्चिन्त सो न जाऊं। 
Afloat

Lull, for too long,
Long for a storm to storm.
Lightening to enlighten,
Veil to unveil,
Peace to prevail.

There, yet not there?
Wait not....... dear
Make it happen.
Sleep not......
Be awake........
Impetus is around .

Why, I hear no Sound,
Tremors, I do feel,
Will it be full of, zeal
Or just a gentle Breeze,
Quietning, caressing, Melting,
Awakening to Thee.

I merge with Thee,
Steal every moment.
I merge with Thee.
Time is, Vehicle 
I merge with Thee.
Soul and Mind, I merge with Thee.


A Tree, be me
And merge with Thee
No Lull, No Storm
Just Be..............